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आप भी वीणा पर भजन गाकर पा सकते है लाखों, दानजी मारवाड़ भजनी पुरस्कार आवेदन की अंतिम तिथि अब 20 मार्च तक

  • एक लाख रुपए की नगद राशि एवं 5 लाख रुपए के वाद्य यंत्र होंगे भेंट
  • वाणी उत्सव 2024 होगा 29 व 30 मार्च को

जालोर. रूमा देवी फाउंडेशन और ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान द्वारा आयोजित किए जाने वाले राजस्थान के प्रतिष्ठित वाणी उत्सव में आवेदन की अंतिम तिथि को 15 मार्च से बढ़ा कर अब 20 मार्च कर दिया गया है ।

परम्परागत वीणा पर भजन गाने वाले कलाकार वाणी उत्सव में भाग लेने के लिए 20 मार्च तक rumadevifoundation.org पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं । उत्सव का आयोजन आगामी 29 एवं 30 मार्च को शिव शक्ति धाम, जसदेर तालाब, बाड़मेर में किया किया जाएगा। विजेता कलाकारों को “दानजी स्मृति मारवाड़ भजनी पुरस्कार – 2024 प्रदान किया जायेगा। पुरस्कार के रूप में चार श्रेणी में एक लाख रुपए के पुरस्कार और 50 अन्य कलाकारों को 5 लाख के वीणा वाद्य यंत्र भेंट किए जायेंगे । चयनित कलाकारों को 29 को कार्यक्रम स्थल पर पहुँच कर प्रस्तुती देनी होगी। विजेता कलाकारों को 30 मार्च को दानसिंह की पंचम पुण्यतिथि पर सम्मानित किया जायेगा। वाणी उत्सव में राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात तथा पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए कलाकार भाग ले रहे हैं।

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रुमा देवी फाउंडेशन की निदेशक राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता व हार्वर्ड स्पीकर डाॅ रूमा देवी ने बताया की परम्परागत वीणा गायन कला के संरक्षण की मुहीम के तहत इस सालाना कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है । राजस्थान के रेगिस्तान में कबीर मीरा जैसे संतों की भुलाई जा रही सामाजिक समरसता की प्रेरणा देने वाली अद्भुत वाणियों को उनके मूल स्वरूप में दो दिवसीय वाणी उत्सव में गूँजायमान किया जायेगा। इस उत्सव हेतु संस्थान द्वारा 800 से अधिक वाणी गायकों के ऑनलाइन आवेदनों की स्क्रीनिंग चल रही है।

नवोदित कलाकारों को भी मिलेगा मौका

आवेदन की अंतिम तिथि में बढ़ोतरी के कारण वो कलाकार भी इस उत्सव में भाग ले सकेंगे, जो किसी कारणवश अब तक आवेदन नहीं कर पाए है। इसमें कोई भी नवोदित कलाकार 20 वर्ष तक, युवा कलाकार 21 से 45 वर्ष, वरिष्ठ कलाकार 45 वर्ष से ऊपर एवं वीणा भजन परंपरा के संरक्षण के लिए विशेष कार्य करने वाले संगठन, संस्थान या व्यक्ति भाग ले सकता है।

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क्या है वीणा गायकी

संस्थान के सचिव विक्रम सिंह ने बताया कि हिन्दुस्तान में सदियों से चली आ रही हमारी संस्कृति में वाणी गायन की समृद्ध परंपरा रही है जो कि छुआछूत, ऊंच – नीच, अमीर – गरीब और धार्मिक भेदभाव की खाई को मिटाकर सामाजिक समरसता स्थापित करने का संदेश देती आई है। थार के मरुस्थल में हर धार्मिक उत्सव, सत्संग, जमा- जागरण में सुनाई देने वाला वीणा गायन वर्तमान समय के इलेक्ट्रॉनिक बाजों के शोरगुल में संकुचित होकर थम सा गया है। भक्ति काल से लेकर आधुनिक काल की शुरुआत तक वीणा हर गांव – शहर की सत्संग व जागरणों की शान हुआ करता था, अब यह वाद्य यंत्र लुप्त होने की कगार पर है। पांच तार वाले इस इस वाद्य यंत्र से निकलने वाली मधुर ध्वनी से वातावरण सकारात्मक हो जाता था। वीणा के सुर के साथ वाणियों की लहर गूंजती थी। वीणा लोकवाणी गायन कला का अभिन्न हिस्सा रहा है। वर्तमान में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्र के प्रयोग व उचित संरक्षण नहीं मिलने के कारण उतम गुणवत्ता के वीणा बहुत कम देखने को मिलते है.

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रूमा देवी ने बताया कि वर्तमान में कम होते वीणा के चलन तथा प्रोत्साहन न मिलने के कारण इसका निर्माण बहुत कम हो गया है और गुणवत्ता स्तर घटता जा रहा है । कभी गांवों में भी हस्तशिल्पी इसका उत्पादन किया करते थे, लेकिन अभी इसका निर्माण राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित केतू गांव के कुछ सुथार परिवार कर रहे हैं। लेकिन दिनों – दिन यह भी कम होता जा रहा है, इस वाद्य यंत्र के संरक्षण हेतु बनाने वाले हस्तशिल्पियों के रोजगार को बढ़ावा देने की जरूरत है ।

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