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जालोर

कलेक्टर की गैर मौजूदगी में डेढ़ घण्टे देरी से शुरू हुई जालोर जिला परिषद की बैठक में दो बार अधिकारियों ने किया वॉकआउट, नर्वस नजर आए जिला प्रमुख

  • अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों पर लगाए अशोभनीय भाषा के आरोप
  • जनप्रतिनिधियों ने भी सुनाई खरी-खोटी

दिलीप डूडी, जालोर. जालोर जिला परिषद की साधारण बैठक गुरुवार को जिला प्रमुख राजेश राणा की अध्यक्षता में हुई। सांचौर नया जिला बनने के बाद भी परिसीमन नहीं होने के कारण दोनों जिलों की बैठक यहां हुई, लेकिन बैठक में जो नाटकीय घटनाक्रम हुआ, वो एक सदन के स्वच्छ संचालन के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। यहां अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच न केवल बहसबाजी हुई बल्कि दो बार अधिकारी सदन से वॉक आउट कर गए। पहली बार वॉक आउट करके गए अधिकारियों को मनाने के लिए जिला प्रमुख ने तीन बार चक्कर लगाए। वहीं दूसरी बार स्वयं कलेक्टर व एसपी को आते देख अधिकारी सदन में लौटे। उसके बाद बिंदुवार बैठक चली, जिसमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा कर आवश्यक निर्देश दिए गए। आइए जानते है बैठक में

क्यों हुआ नाटकीय घटनाक्रम

जालोर जिला परिषद की बैठक 22 फरवरी को सुबह 11.30 आहूत की गई थी, निर्धारित समय अनुसार सदस्य व जिला स्तरीय अधिकारी सदन में पहुँच गए थे। लेकिन सुनवाई के लिए केवल जिला प्रमुख राजेश राणा व कार्यवाहक सीईओ केएल सोनी ही मौजूद थे। यहां न तो कोई विधायक था और न ही दोनों जिलों के कलक्टर व एसपी। यहां सांचौर कलेक्टर के प्रतिनिधि रूप में बागोड़ा एसडीएम गरिमा शर्मा व सांचौर एसपी के प्रतिनिधि के रूप में रानीवाड़ा डीएसपी पुष्पेंद्र वर्मा मौजूद थे। पहले जनप्रतिनिधियों ने इस बात की नाराजगी जाहिर की और कहा कि जिला परिषद की बैठक में अधिकारी स्वयं मौजूद होने चाहिए, उनके प्रतिनिधि क्यों भेजे गए। इनके इंतजार में करीब डेढ़ घण्टे बाद 1.09 बजे बैठक शुरू हुई। यहाँ बिंदुवार चर्चा शुरू की। पहला बिंदु जल जीवन मिशन से जुड़ा था, जिस पर सुनवाई शुरू हुई। यहां जवाब देने के लिए जेजेएम के अधीक्षण अभियंता (एसई) आशीष द्विवेदी हाजिर हुए। जिला परिषद सदस्य प्रवीण विश्नोई, जयंतीलाल पुरोहित, प्रवीण माली ने सवाल पूछने शुरू किए। जिला परिषद सदस्य महेंद्र चौधरी ने जेजेएम में पाइपों की गहराई, डेप्थ आदि की जानकारी चाही। इस दौरान जिला परिषद सदस्य प्रवीण माली ने कहा कि जेजेएम में बहुत भ्रष्टाचार है, इन अधिकारी के जितना कोई भ्रष्ट नहीं है। इस पर आशीष द्विवेदी गुस्सा गए, हंगामा हो गया, उनके आक्रोश को देख सभी अधिकारियों ने वॉक आउट कर दिया। सभी अधिकारी कलेक्टर सभाकक्ष में चले गए। वहां एडीएम वीसी मीणा को अपनी परिवेदना दी। वहीं आशीष द्विवेदी को बीपी बढ़ने का हवाला देते हुए अस्पताल ले जाया गया। उसके बाद इधर जिला प्रमुख राजेश राणा हक्का बक्का हो गए, कुछ देर अधिकारियों का इंतजार करते रहे, लेकिन अधिकारी नहीं माने, तीन बार जिला प्रमुख उन्हें मनाने गए और भरोसा दिलाया कि अधिकारियों के साथ इस तरह का बर्ताव नहीं होने देंगे। उसके काफी देर बाद फिर अधिकारी सदन में पहुंचे। यहां अधिकारियों ने पंचायतीराज एक्ट का हवाला देते हुए सदस्यों को शोभनीय शब्दों के इस्तेमाल की बात कही। इस दौरान जिला परिषद सदस्य प्रवीण विश्नोई ने कहा कि अगर कोई अधिकारी पूर्व की अनुपालना की जानकारी नहीं देगा या फिर जवाबदेहिता नहीं निभाएगा तो सदस्य भी वैसा ही व्यवहार करेंगे। हमें भी जनता को जवाब देना पड़ता है। इतना कहते ही पीडब्ल्यूडी के अधीक्षण अभियंता तैश में आ गए और उन्होंने सभी अधिकारियों को कहा कि चलो बाहर, फिर सभी अधिकारी वॉक आउट कर गए। मामला बिगड़ता देख तत्काल जिला कलेक्टर पूजा पार्थ व जिला पुलिस अधीक्षक श्यामसिंह भी पहुंचे। इन दोनों को देख सारे अधिकारी पुनः सदन में लौटे। उसके बाद व्यवस्थित सदन चला। अधिकारियों ने इस घटनाक्रम को लेकर मुख्य सचिव को पत्र भेजा है, जिसमें लिखा कि जनप्रतिनिधियों की ओर से अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिनके विरुद्ध कार्रवाई की जाय।

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बैठक में उठाये किसानों के हित के मुद्दे

बैठक में प्रवीण विश्नोई ने किसानों घरों तक ट्रांसफॉर्मर पहुंचाने के मामले की जानकारी चाही। वहीं उषादेवी जोगराज राजपुरोहित ने किसानों के मामले को उठाया। साथ ही प्रवीण माली ने कहा कि हम अधिकारियों का सम्मान करते है, लेकिन वे हमारे फोन तक रिसीव नहीं करते। इसके अलावा स्कूलों से गुजर रही विद्युत तारों का भी मामला उठाया।

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दोनों तरफ से हुई गलतियां

जिला परिषद का सदन में गुरुवार को दोनों तरफ से गलतियां हुई। पहली तो यह कि सदस्य प्रवीण माली की ओर से एसई आशीष द्विवेदी पर व्यक्तिगत लांछन नहीं लगाने चाहिए थे, जबकि माली ने द्विवेदी को चोर और सबसे भ्रष्ट कहा। वहीं सदस्य की ओर से गलती करने पर सभी अधिकारियों को वॉक आउट नहीं करना चाहिए था, क्योंकि यह कोई एक यूनियन नहीं थी, जबकि बैठक के सचिव सीईओ सदन में इंतजार कर रहे थे। अधिकारियों को अपनी नाराजगी सदन के समक्ष ही जाहिर कर देनी चाहिए थी।

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