DDT News
प्रदेशसामाजिक गतिविधि

पारंपरिक कालबेलिया नृत्य को पहचान दिलाती राखी ✍️ शेफाली मार्टिन्स

पुष्कर मेले या कोई भी राजस्थानी त्यौहार, चमकीले कपड़े पहने कालबेलिया नर्तकियों के बिना अधूरा माना जाता है. इस नृत्य को 1980 के दशक में राजस्थान की एक बंजारा समुदाय की प्रसिद्ध नर्तकी गुलाबो सपेरा की बदौलत दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली है. काले आधार वाले रंग-बिरंगे घाघरा में सजी, कालबेलिया महिलाओं का नृत्य अपनी तेज चाल और लचीलेपन से लाखों स्थानीय और विदेशी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है. कई कालबेलिया महिलाएं आज दुनिया भर में अपनी इस कला का प्रदर्शन करती हैं. मगर वापस आकर फिर से उसी गरीबी और उपेक्षा के जीवन में लौट आती हैं. दुनिया में डांसिंग मास्टर के रूप में भी लोकप्रियता हासिल करने वाली इन प्रतिभाशाली नर्तकियों में एक है ‘राखी कालबेलिया’, जो पुष्कर से सटे गनहारा की कालबेलिया कॉलोनी में अपने परिवार के साथ रहती है. जैसे ही आप इस कॉलोनी में प्रवेश करने के लिए एक रेतीले रास्ते पर आगे बढ़ेंगे, आपको राखी के घर की सामने की दीवार पर ‘कालबेलिया आर्ट अकादमी’ शब्द लिखे मिलेंगे.

राखी अपने जीवन में कभी स्कूल नहीं गई है, लेकिन विदेश में अपने छात्रों के साथ टूटी-फूटी लेकिन आत्मविश्वास से भरी अंग्रेजी में बातचीत करते ज़रूर नज़र आ जाएगी. ये वे छात्र हैं जो विश्व प्रसिद्ध पुष्कर मेले में समय बिताने और भारत के विभिन्न नृत्यों को सीखने के लिए विभिन्न देशों से आते हैं. कालबेलिया या सर्प नृत्य उन्हीं में से एक नृत्य है. राखी कहती है, “मैं 13 साल की उम्र से नृत्य सिखा रही हूं और पिछले 16-17 वर्षों से पुष्कर के पुराने निगजी मंदिर के नृत्य विद्यालय में प्रशिक्षण दे रही हूं. पहले हमारे समुदाय की महिलाएं खुद ही परफॉर्म करती थीं, वे किसी और को डांस नहीं सिखाती थीं, लेकिन अब नृत्य सिखाना बहुत लोकप्रिय हो रहा है.”

Advertisement

राखी को किसी ने कालबेलिया नृत्य नहीं सिखाया है, ये उनके खून में दौड़ता है. वह बताती है कि ”मेरी बड़ी बहनें यह नृत्य किया करती थीं और मैं उनकी नकल करती थी. हमारे समुदाय में कोई भी इस नृत्य को नहीं सीखता है. हम विदेशियों और भारतीयों को सिखाते हैं, लेकिन यह स्वाभाविक रूप से हम कालबेलियाई महिलाओं को आता है.” उसने नृत्य कार्यशालाओं के प्रदर्शन और संचालन के लिए इटली, फ्रांस, स्पेन, ऑस्ट्रिया, जर्मनी और इंग्लैंड सहित कई देशों का दौरा किया है. वह तीन से सात दिन की कार्यशालाओं के साथ दो महीने के दौरे पर विदेश जाती है. इन कार्यशालाओं का आयोजन वहां के छात्र करते हैं और उसकी यात्रा और आवास की व्यवस्था भी करते हैं. हर साल उनके पास बड़ी संख्या में विदेशों छात्र नृत्य सीखने आते हैं. जिनमें पिछले सात साल से आ रहे एक अमेरिकी, चिली और मैक्सिको के छात्र शामिल हैं.

राखी ने शो के लिए भारत में भी बड़े पैमाने पर दौरा किया है. कार्यक्रम के आयोजक उसके लिए व्यवस्था करते हैं और उसका सम्मान भी करते हैं. भले ही उसे कम पैसे मिलते हों, लेकिन वह इसी से काफी खुश है कि उसकी कला को सम्मान दिया जाता है. वह कालबेलिया समुदाय पर लिखी एक किताब दिखाती है और उत्साह से कवर की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, “देखो, मैं इस किताब में इटालियन भाषा में छपी हूं. मैं एक राजस्थानी भाषा की फिल्म का भी हिस्सा रही हूं. मेरी शादी 21 साल की उम्र में हुई थी, मेरे पति साधु और उनका परिवार मेरे काम में सहयोग करता है. साधु हमारे कार्यक्रम के दौरे को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं और कार्यक्रम के दौरान वाद्य यंत्र भी बजाते हैं.”

Advertisement

दुनिया भर के छात्रों को नृत्य सिखाने वाली राखी अभी भी बिना बिजली वाले घर में रहती है. वह बताती है कि, “इतनी प्रसिद्धि के बाद भी, हम अभी भी वहीं हैं, जहां पहले थे. हमारे जीवन में बहुत बदलाव नहीं आया है. कालबेलियों के लिए रहने को कॉलोनी तो मिल गई है लेकिन सुविधाएं बहुत कम हैं. मेरे घर में छह महीने पहले ही पानी का कनेक्शन आया है. पहले हमें हैंडपंपों से पानी भर कर लाना होता था.” वह बताती है कि शादी से पहले वह अपनी मां के साथ अस्थाई टेंट में रहा करती थी. उसकी मां आज भी उसी अस्थाई टेंट में रहती है. राखी एक क्लास के लिए पांच सौ रुपये प्रति घंटा चार्ज करती है. यह राशि कक्षाओं के लिए बुकिंग के समय ही एकत्र की जाती है, हालांकि ये बुकिंग नियमित नहीं होती है. विशेष रूप से पिछले तीन वर्षों में कोरोना के कारण बहुत अधिक काम नहीं किया है, लेकिन वह इस वैश्विक महामारी के दौरान भी ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित करने में सफल रही है. अपनी आय के बारे में बताते हुए राखी कहती है कि, “शो के लिए यात्रा और आवास खर्च की व्यवस्था करने के अलावा, कार्यक्रम के आयोजक आमतौर पर पूरे समूह के लिए 5,000 से 6,000 रुपये का भुगतान करते हैं. औसतन, हमारे पास दस लोगों का एक समूह है, इसलिए लगभग हर व्यक्ति को प्रदर्शन के लिए पाँच सौ रुपये मिलते हैं.”

अपने प्रदर्शन में कालबेलिया नर्तकियां चरी नृत्य (सिर पर मटकी रखकर आग जलाना और नृत्य करना), प्रैट नृत्य (एक बड़े थाल के किनारे पर नृत्य करना), नाखूनों और दर्पणों पर नृत्य करना आदि शामिल है. इन खतरनाक नृत्यों में संतुलन की एक छोटी सी चूक कलाकार को चोटिल कर सकती है. हालांकि आधिकारिक रूप से प्रतिबंध के बाद, समुदाय अब सांपों को अपने खेल का हिस्सा नहीं बना सकते हैं, जैसा कि वे प्रतिबंध से पहले करते थे. सांप के साथ नृत्य उनके अस्तित्व का एक अभिन्न अंग है. राखी कहती हैं, ‘हमारा डांस ही सांप की हरकतों से शुरू होता है.’ बीन का संगीत इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. सांप हमारे जीवन से अलग नहीं है.” डांस में पीढ़ीगत बदलाव की चर्चा करते हुए राखी कहती है कि ‘पहले वह स्टेज पर या होटलों में परफॉर्म नहीं करती थीं. छोटे-छोटे गांवों में स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन आयोजित किए जाते थे. अब ये पेशेवर रूप से स्टेज शो, शादी समारोह और ऐसे आयोजनों के लिए किए जाते हैं.’ स्कूल नहीं जाने के बावजूद फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने के बारे में उसके पति साधु कहते हैं कि ‘हम बचपन से पुष्कर के बाजारों में विदेशियों के संपर्क में रहे हैं. जहां कई विदेशियों के साथ बातचीत करके हम धीरे धीरे सीख जाते हैं. दरअसल, जिंदगी हमें अंग्रेजी सिखाती है.”

Advertisement

राखी तीन बच्चों की मां हैं और अपनी सबसे छोटी दो साल की बेटी कोमल के कालबेलिया नृत्य सीखने को लेकर उत्साहित हैं. वह कहती हैं, ”जब मैं नृत्य करती हूं तो कोमल पहले से ही वह स्टेप करना शुरू कर देती है. मुझे यकीन है कि वह पढ़ेगी भी और नृत्य भी सीखेगी. जब मैं क्लास लेती हूं तो वह रोती नहीं है बल्कि उत्साह से भाग लेती है.” वहीं उसके दोनों बेटे, सात वर्षीय दुर्गेश और पांच वर्षीय जैक लोक संगीत बजाना सीख रहे हैं. वह कहती है कि मैं अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहती हूं ताकि उन्हें मेरी तरह आने वाली कठिनाइयों का सामना न करना पड़े”.

आज राखी अपने समुदाय में मिली पहचान से संतुष्ट है. वह गर्व से कहती हैं, “छोटी लड़कियां मेरा अनुकरण करना चाहती हैं. मैंने जो किया है, उसकी सराहना होती है. मैं केवल अपने परिवार ही नहीं बल्कि अपनी कॉलोनी के लिए भी काम करती हूं. वर्षों पहले तक यहां पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं थी. मैंने कुछ स्थानीय पत्रकारों से बात की, जिन्होंने इसके बारे में लिखा और यह रास्ता बन गया, नहीं तो यहां एक मोटरसाइकिल भी नहीं आ पाती,” वह बताती है कि कैसे उसने अपने विदेशी संपर्कों के माध्यम से अपने क्षेत्र के बाहर काम करने वाले कलाकारों के लिए कोरोना राहत कार्य में भाग लिया था. राखी अपने सपनों के बारे में बताती है कि मुझे अपने कालबेलिया नृत्य से प्यार है. मैं जीवन भर यह नृत्य करना चाहती हूं. दरअसल, यह एक विरासत है जिसे वह अपने आने वाली पीढ़ी तक सफलतापूर्वक पहुंचना चाहती है. यह लेख संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2022 के तहत लिखा गया है. (चरखा फीचर)

Advertisement

Related posts

इंदिरा गांधी स्मार्ट फोन योजना के तहत जालोर जिले में अब तक 2178 पात्र लाभार्थियों को मिला स्मार्ट फोन

ddtnews

सोनगिरि पर्वत पर वीरमदेव मूर्ति स्थापना के लिए सर्वसमाज की बैठक

ddtnews

ब्राइड ट्रैफिकिंग : पांच हजार से लेकर बीस हजार में ये लड़कियों बिक जाती हैं

ddtnews

जागनाथ महादेव मंदिर में वार्षिक मेले का आयोजन

ddtnews

सेवानिवृत्ति समारोह के उपलक्ष्य में एक शाम जम्भेश्वर के नाम भजन संध्या का आयोजन किया

ddtnews

पीर गंगानाथ महाराज जलंधरनाथ धर्मशाला समिति (ट्रस्ट) के पुनः निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित

ddtnews

Leave a Comment