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वीरांगना हीरा दे के पराक्रम पर्व की 711 वीं वर्षगांठ पर जालोरवासियों ने किया नमन

जालोर. वीरांगना हीरादे के बलिदान पराक्रम दिवस के अवसर पर जालौर में हीरा दे स्मरण सभा एवं दीपदान कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का आयोजन स्वर्णगिरी और कणियागिरी पर्वतमाला की तलहटी में स्थित आदर्श विद्या मंदिर में किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने जालौर के इतिहास को गौरवशाली एवं पूरी दुनिया के लिए प्रेरक बताते हुए वर्तमान में उससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता जताई।

कार्यक्रम में मौजूद शहरवासी।

इस अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आदर्श विद्या मंदिर उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य नितिन ठाकुर ने कहा कि हीरादे ने अपने ऐतिहासिक निर्णय और उसके क्रियान्वयन के द्वारा पूरे देश को “राष्ट्र सर्वोपरि” का संदेश दिया है। पद्मनाभ द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रन्थ कान्हड़देव प्रबंध, नैणसी री ख्यात एवं अन्य समकालीन साहित्य में हीरा दे के पराक्रम का उल्लेख मिलता है। उन्होंने जालौर भीनमाल और सांचौर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए उसे पूरे विश्व के लिए अत्यंत प्रेरक बताया।

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युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखते हुए संस्कृति शोध परिषद की नीलम पंवार कहा कि दिल्ली के सुल्तान अल्लाउदीन खिलजी की सेनाएं दो बार यहाँ परास्त हुई। अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात विजय करने के लिए दिल्ली से अभियान प्रारंभ किया। गुजरात विजय के बाद जीत के अहंकार में आक्रांता अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना जबरन जालोर के मार्ग से निकल रही थी, घमासान युद्ध हुआ। जालौर के सैनिकों ने भगवान सोमनाथ महादेव के शिवलिंग को, हजारों बंदियों को मुक्त करवाया गया, सुल्तान की बची हुई सेना जान बचाकर भागी। इसके बाद एक बार और युद्ध हुआ। उसमें भी खिलजी की सेना परास्त हुई। संवत 1368 में तीसरा भयंकर युद्ध हुआ जिसमें प्रबल पराक्रम के बावजूद आपसी भितरघात से जालोर किले पर सुल्तानी सेना का कब्जा हुआ। माता हीरा दे ने अपनी कर्तव्यपरायणता और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत अकल्पनीय उदाहरण प्रस्तुत किया जब उन्होंने राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ भीतरघात करने वाले अपने लालची पति का स्वयं वध कर दिया। यह दुनिया के इतिहास की एकमात्र घटना है जब राष्ट्रहित में नारी में अपने पति का सर कलम कर दिया हो।

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि परमानंद भट्ट ने जालोर पराक्रम पर्व के इतिहास को काव्यात्मक रूप में सदन के सामने रखा। उन्होंने हीरा दे को समर्पित अपनी कविता का वाचन करते हुए कहा कि धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु सर्वस्व अर्पित कर देना ही जीवन की सर्वोत्तम गति है।

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उन्होंने कहा कि जो इतिहास पढ़ते हैं, इतिहास याद रखते हैं वह इतिहास से सीखते भी हैं और वही लोग इतिहास रचते भी हैं अतः अपने इतिहास के गौरवशाली प्रसंगों को आने वाली पीढ़ी तक ले जाने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम लगातार होते रहने चाहिए। नई पीढ़ी में ऐतिहासिक राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन करने के लिए इतिहास से जुड़े कार्यक्रम विचार गोष्ठियों सतत रूप से होते रहने चाहिए।

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हीरा दे स्मृति दीपदान कार्यक्रम को मुख्य वक्ता के रूप में एनसीटीई सदस्य एवं संस्कृति शोध परिषद के निदेशक संदीप जोशी ने संबोधित किया। संस्कृति शोध परिषद के उपाध्यक्ष कल्पेश बोहरा ने कार्यक्रम का संचालन किया एव सभी का आभार ज्ञापित किया।

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यह रहे उपस्थित

इस अवसर पर कार्यक्रम में जगदीश दवे,भरत गोयल ,सत्यम मोर, प्रेमसिंह राठौड़ , देवेन्द्र नाग, भगाराम सुथार, गुणेशसिंह राजपुरोहित, ग्रेनाइट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष प्रकाश परमार, दिलीप शर्मा, ज्ञानेश त्रिपाठी, प्रवीण शर्मा, रमेश बोहरा, गणेशाराम सुथार बीना शर्मा , गायत्री शशि राठौड़, दिलीप दवे विद्यालय आचार्य व आदर्श छात्रावास के विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी ने दीपदान व पुष्प अर्पित किये।

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