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जालोर

मनरेगा कार्यस्थलों पर सुबह बीडीओ निरीक्षण करके चले गए, न छाया की व्यवस्था का पूछा और न ही फर्स्ट एड का

  • छिपरवाड़ा व बुडतरा में मनरेगा कार्य स्थलों पर नहीं है व्यवस्थाएं

जालोर. मनरेगा स्थल पर श्रमिकों की सुविधाओं के लिए सरकार ने व्यवस्थाएं कर रखी है, लेकिन कार्यस्थलों पर उपयोग नहीं किया जा रहा है। खासकर गर्मी के मौसम में जो व्यवस्थाएं होनी चाहिए, वो नहीं होने पर श्रमिकों को परेशानी होती है। आज हम बात कर रहे है आहोर उपखण्ड क्षेत्र के छिपरवाड़ा व बुड़तरा में संचालित मनरेगा कार्यों की। छिपरवाड़ा में मुख्य रोड पर तालाब में मनरेगा कार्य संचालित है। यहां मंगलवार को 50 श्रमिक कार्य करने पहुंचे थे। इस स्थल पर छह पुरुष श्रमिकों को छोड़कर सभी महिला श्रमिक है, लेकिन यहां छाया के लिए न तो टेंट की व्यवस्था है और न ही प्राथमिक उपचार की व्यवस्था।

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इतना ही नहीं यहां नन्हे मासूमों के लिए झूलों की भी व्यवस्था नहीं है। ऐसी स्थिति में यहां श्रमिकों को बड़ी परेशानी झेलनी पड़ती है। यहां तेज धूप में छाया के लिए टेंट नहीं होने के कारण खुद श्रमिक अपने स्तर पर लकड़ियां डालकर छाया की व्यवस्था करने को मजबूर है। ऐसा नहीं है कि अधिकारियों को इस बारे में ध्यान नहीं है, बल्कि स्वयं आहोर विकास अधिकारी मंगलवार को सुबह इस कार्य स्थल का निरीक्षण करके गए थे। इसके बावजूद बीडीओ ने इन व्यवस्थाओं के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया। मेट नरपत देवासी ने बताया कि छांव के लिए यहां ग्राम विकास अधिकारी को कई बार अवगत करवाया, लेकिन वे जल्दी व्यवस्था करने का बोलकर टाल रहे है। इस कारण यहां श्रमिक अपने स्तर पर ही लकड़ियों से छांव करते है। देवासी ने बताया कि एकाध महिला नन्हे मासूम साथ लाती है, झूले की व्यवस्था नहीं है।

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बुडतरा में तो पानी की व्यवस्था भी नहीं

मनरेगा कार्यस्थलों पर छाया पानी समेत सुविधाओं के लिए सरकारी व्यवस्थाएं है, लेकिन अधिकारी इसकी ओर ध्यान नहीं देते है। बुडतरा की बोखी नाडी में चल रहे मनरेगा कार्य स्थल पर तो पानी की भी व्यवस्था नहीं है। श्रमिकों को घर से पानी लाना पड़ता है। यहां भी टेंट की व्यवस्था नहीं होने के कारण कांटों वाले बबूल की छांव देखनी पड़ती है, जो कुछ दिनों बाद काटे जाने है। यहां मेट विक्रमसिंह ने बताया कि पानी लाने के लिए कोई टैंकर वाला तैयार ही नहीं हो रहा है।

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टैंकर वालों का कहना है कि कम पैसे मिलने के कारण वे यह व्यवस्था नहीं कर पा रहे है। इस कारण यहां पानी की व्यवस्था श्रमिकों को खुद के स्तर पर ही करनी पड़ती है।

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